शुक्रवार, 27 जून 2014

दिल में जो आये वो पैगाम लिखना

दिल में जो आये वो पैगाम लिखना
हमने सहर लिखा.. तुम शाम लिखना

कुछ इस तरह से दिलों के रंज भुला
मेरे हिस्से कि धूप भी अपने नाम लिखना

कलम जमाने से रख के रूबरू
महके जो हर खिजां में वो बाम लिखना

मन को फैला के दुनियाँ से बड़ा
कभी काबा तो कभी चार-धाम लिखना

कौशल इस तरह अपनाना खुद को
दिल कि बात दिल से बे-लगाम लिखना

समय बड़ा बलवान

राजा को तू रंक बना दे
रंक को दे दे ताज
बिछडो को तू गले मिलाये
मीतो को बिछडाये
तेरे तो गुणगान करे
सब लोग लगाये आस
अब बदलेगी किस्मत मेरी
सर पर होगा ताज
बनके ऑफिसर आऊंगा
गर तू रहा मेहरबान
शासन देश का चलाऊंगा
गर तूने दे दिया ताज
समय बड़ा बलवान रे भाई
समय बड़ा बलवान ....    

शुक्रवार, 16 मई 2014

यूँ कुछ ...

आस-पास कुछ अहसासों की बात-चीत होती देखी है
दूर किनारे ,साँझ-सकारे पंछी की टोली देखी है
खोज-खबर रखने वालो की ये कैसी हालत देखी है
मुह में राम बगल में छूरी कैसी फरमाईस देखी है ||

भोले-भाले चेहरे है पर ,दिल में छुपी नफरत देखी है
ऊच-नीच और जात-पात की खिची हुयी सरहद देखी है
राह गुजरते यूँही चलते बात बड़ी रोचक देखी है
तू-तू में-में करने की हाय गजब फितरत देखी है ||

बुधवार, 23 अप्रैल 2014

बातों बातों में -१...( लघु कथा)

ट्रिन ट्रिन ... डोरबेल कि उस कर्कस आवाज ने उसे नीद से जगा दिया था . घडी में टाइम देखा ये सुबह के ६ बजे थे और आज तो शनिवार है छुट्टी का दिन आज कौन सुबह सुबह परेशान करने आ गया |
यही सब बडबडाते हुए आँखें मलते उसने दरवाजा खोला तो देखा सामने १२,१३ साल कि एक छोटी बच्ची खड़ी है हाथ में एक थाली जिसपर एक भगोने में सरसों का तेल और कुछ सिक्के पड़े हैं , और थाली में माँ वैष्णव देवी दरवार कि फोटों |
बिना उस लड़की के कुछ बोले वो अपना पर्स लेने चला गया और १० रुपये उसकी थाली में रख कर दरवाजा बंद कर दिया ....
आखिर सुबह सुबह अपनी नीद खराब कर, भगवान और उस लड़की कि दशा पर बहस करके कौन मुसीबत मोल ले .....

शनिवार, 8 मार्च 2014

रात

अकसर धुप निकल आती है
रात बड़ी छोटी होती है
दूर सितारों के ढलते ही
परियों की बस्ती रोती है

चाँद अकेला बिखरे तारे
सब जगमग-जगमग होती है
सच्ची दुनिया से अच्छी तो
सपनो की बस्ती होती है

रविवार, 2 मार्च 2014

मुर्दा होना आसान नहीं

जीते जी
मुर्दा होना आसान नहीं
छोड़ने पड़ते है बहुत से ख्वाब
मारना पड़ता है अरमानो को
लंबी चादर ओढ़ सन्नाटे की
जज्बात, अल्फाज, हालात
सब कुछ मिटाने पड़ते हैं
क्यूंकि
जीते जी
मुर्दा होना आसान नहीं .....

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

यूँ ही ...

अंतर्द्वंद तेरे अंदर भी है मेरे भी
पत्थर से चोट लगने पर
दर्द तुझे भी होता है मुझे भी
कुछ निरीह भाव
तेरे मन को भी उद्द्वेलित करते हैं
मेरे मन को भी
विचारों के टकराव में स्पंदन
तेरे अंदर भी है मेरे भी
फर्क है तो वो बस इतना है
तुझे दिखाना आता है और मुझे छुपाना .....