मेरे अपने
डायरी के पन्ने...
मंगलवार, 17 सितंबर 2013
ये कैसी आबो-फज़ा हो गयी
ये कैसी आबो-फज़ा हो गयी
इंसानियत रो-रो के क़ज़ा हो गयी
मजहबी हाथों पे जनाजा उठा
सारी दुनिया कि सजा हो गयी
मोशिकी सीख थी खुदाया की
बदलके वो ही मज़ा हो गयी
दर्दमंदों को अब ये लगता है
खुदा की ये ही रजा हो गयी
यूँ ही...
याद
आता
है
,
भूल
जाता
है
गुजर
लम्हा
कुछ
यूँ
सताता
है
कोई
शिकवा
न
रहा
जमाने
से
कौन
खोता
है
,
कौन
पाता
है
रविवार, 30 जून 2013
बेखुदी में भी प्यार आ जाए
बेखुदी में
भी प्यार आ जाए
फिर से वोही बयार आ जाए
कब से खामोश है कलम मेरी
कुछ लिखूं तो करार आ जाए
कैसी फितरत बना ली आदम ने
थोडा रहमो-ख्याल आ जाए
जब भी जिक्र गुजरे अफ्शाने करो
नजर में वो ही प्यार आ जाये
सजदा है कभी न आये खलिश
साजे धुन पर सितार आ जाए
पल सम्हल जाए सबके जीवन में
‘
हर्फ़
’
जो यादगार आ जाए
शुक्रवार, 8 मार्च 2013
मुझको ही आज कल....
में राम नहीं कहता
रहमान नहीं कहता
गलियों के भेद को में
इमान नहीं कहता
कस्बों रियासतों में
जो देश को है बाँटे
उस सोच ,बंदगी को
सलाम नहीं कहता
बस एक दिन बना क्या
इंशां को समझने में
बाकी दिन क्या तुमको
ये काम नहीं रहता
बंद कमरों में रहकर
जो सियासी चाल चल रहा है
वो शख्स फिर बदल कर
यूँ आम नहीं रहता
आतंक को मजहब से
यूँ जोड़ के न देखो
जो समझता है ऐसा
इन्शान नहीं रहता
कोई लिख रहा प्रभु है
कोई रट रहा खुदा है
एक दूसरे से होड़
पूजा या अजान नहीं रहता
किस बात को में बोलूं
किस बात को में छोडू
मुझको ही आज कल क्या
आराम नहीं रहता
शनिवार, 5 जनवरी 2013
नया मिलने पे अक्सर ही पुराना छूट जाता है
कभी ये पल कभी बीता फशाना याद आता है
यही दो पल कि दुनिया में रुलाता है हँसाता है
यादों के भरे जाम रहें जीने के लिए याद
खाली रखने पे पैमाना अक्सर फूट जाता है
चाहने वाले जिंदगी में साथ हों हरदम
दूरियों से कभी इजहारे-रिश्ता टूट जाता है
आलम ये है बातो ही बातो में कहीं अक्सर
कभी अबका कभी गुजरा ज़माना रूठ जाता है
कई सदी से रहा है यही अंदाज दुनिया का
नया मिलने पे अक्सर ही पुराना छूट जाता है
शनिवार, 24 नवंबर 2012
जख्मी ख्याल भर गए बा-वक़्त साल भी
जख्मी ख्याल भर गए, बा-वक़्त साल भी
रिसता सा खून जम गया काटों के घाव भी
क्या क्या न चीज देखिये पावों में पड़ी हैं
तन्हाईयों की बेड़ियाँ, लिपटे अजार भी
कब से नाम ले के पुकारा करें मुझे
बदनाम हो गए हैं सुखनवर हजार भी
शामो कि रौशनी में नजर-भर समेट लो
जुडकर ही टूटते हैं हों शीशा या ख्वाब भी
कहने को 'हर्फ़' ही में मिला है कदों-जहाँ
जलने के बाद बच गयी यादें और राख भी
मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012
यूँ ही हर्फ़ बनके फिरा करूँ
यूँ ही हर्फ़ बनके फिरा करूँ
यूँ ही हर्फ़ बनके मिला करूँ
जो गुजर रही उस धूल में
तुझे कैसे अपनी सदा कहूँ
वो समझता मुझको रकीब है
में समझता उसको रकीब हूँ
ये तो है निगाह का मामला
में यहाँ रहूँ या वहाँ रहूँ
जो समझना चाहे मुझे समझ
हर रंग को तैयार हूँ
जो लगूं सुबह तो हूँ मखमली
जो बयार हूँ तो बयार हूँ
वो जो बोलते हैं खलूस से
मुझे याद करता नहीं है ‘हर्फ़’
जो रहा नहीं था कभी अलग
उसे कैसे खुद से जुदा कहूँ
नई पोस्ट
पुराने पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
संदेश (Atom)