शनिवार, 4 जनवरी 2014

किसी से पूछते जब भाव है इस चीज का कैसा

किसी से पूछते जब भाव है इस चीज का कैसा
बढ़ाये मोल तारीखे, फकत अंदाज है कैसा

कसक कैसी, फजल कैसा, गनीमत सर तो जिंदा है
यही अब जिक्र है ताज़ा भला अंजाम है कैसा

हमी को लुटते हम से ही अपना घर चलते हैं
पड़ेगी जब जरूरते-जान,मुसाहिद नाम है कैसा

कभी अपना बसेरा गर ना लुट जाये तो फिर कहना
हर एक बात पर लुटता चमन सरकार है कैसा

परेशाँ हो के बैठा गर ना बैठूँगा तो क्या होगा
कि "कौशल" बात है इतनी परेशाँ यार है कैसा

जुबां खुली तो बस उसका ही एक नाम आये

जुबां खुली तो बस उसका ही एक नाम आये
हाथ में जब भी मेरे उसका ये रुमाल आये

अदाये है या है फलक पे आतिश--बिजली
पलक गिरे जो कभी,उसका ही ख़याल आये

जुड़ा है नाम मेरा उसकी बंदगी के लिए
इंतज़ार में उसके दिन ढले कि शाम आये

जिधर उठाऊं नजर बस वही मुकम्मल हो
ख़त का जवाब मेरे ,,शायद इस साल आये

तामाम बाते ......ये मेरी हैं आदतें "कौशल
बस इंतज़ार में हूँ वो आयें या उनका हाल आये

जल के वीराने में कुछ देर, राख हो जाते

जल के वीराने में कुछ देर, राख हो जाते
ख्वाब ऐसे ही घरोंदों से गुजरते जाते__

ख्वाब इन आखो के बेरम हैं बड़े
साथ चलते हैं कुछ दूर फिर मुड़ते जाते__

पैर दर पैर सिमटके चली है तन्हाई
जिस्त से पर्दा किये लोग बदलते जाते__ 

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

उसकी बोली बात का अंजाम ही कुछ और था

उसकी बोली बात का अंजाम ही कुछ और था
कल तलक उस शख्स का पैगाम ही कुछ और था

आज थकती हैं नहीं तारीफ़ में जिसके, जुबाँ
कल तलक उस शख्स का अंजाम ही कुछ और था

बदली बातें बदले चेहरे आईना दिखला रहा
कल तलक उस शख्स का ईनाम ही कुछ और था

कोई बतलाता है मुसाहिद कोई खादिम कहता है
कल तलक उस शख्स का नाम ही कुछ और था

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नफरतो की आग में झुलसे विसाले लोग हैं
फूल खिलते थे जहां वो बाम ही कुछ और था

मंदिरों में या सियासत में जो है अब छाया हुवा
हमने पूजा था जिसे वो 'राम' ही कुछ और था

दूसरों की बात से मतलब है अब रखने लगा
पहले जिस किरदार का काम ही कुछ और था 

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

ये कैसी आबो-फज़ा हो गयी

ये कैसी आबो-फज़ा हो गयी
इंसानियत रो-रो के क़ज़ा हो गयी

मजहबी हाथों पे जनाजा उठा
सारी दुनिया कि सजा हो गयी

मोशिकी सीख थी खुदाया की
बदलके वो ही मज़ा हो गयी

दर्दमंदों को अब ये लगता है
खुदा की ये ही रजा हो गयी

यूँ ही...

याद आता है,भूल जाता है
गुजर लम्हा कुछ यूँ सताता है
कोई शिकवा रहा जमाने से
कौन खोता है, कौन पाता है

रविवार, 30 जून 2013

बेखुदी में भी प्यार आ जाए

बेखुदी में भी प्यार आ जाए
फिर से वोही बयार आ जाए

कब से खामोश है कलम मेरी
कुछ लिखूं तो करार आ जाए

कैसी फितरत बना ली आदम ने
थोडा रहमो-ख्याल आ जाए

जब भी जिक्र गुजरे अफ्शाने करो
नजर में वो ही प्यार आ जाये

सजदा है कभी न आये खलिश
साजे धुन पर सितार आ जाए

पल सम्हल जाए सबके जीवन में
हर्फ़ जो यादगार आ जाए