रविवार, 7 सितंबर 2014

भूख

भूख
सरेआम बिकती है
चौराहों पर
सड़क के किनारे
मंदिरों के बाहर
मस्जिदों के
छोटे गलियारों पर
पेट कि भूख
विचारों कि भूख
अरमानो कि भूख
दरअसल
रोटी का अस्तित्व
ही तब-तक है
जब तक भूख है

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

कैनवास के रंग

कुछ रंग
कैनवास पर फैले हुए
इन्तजार में हैं
अपने अस्तित्व के लिए 
अस्तित्व ...
कि उजाला बनेंगे या अँधेरा
सुबह की मखमली हँसी 
या शाम की सुरमई ख़ामोशी
सुन्दर स्वरुप गढ़ेंगे
या कोई वीभत्स रूप
कैनवास के वो रंग
अब भी निर्भर हैं
कलाकार की सोच पर ....

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

तितली

तरह तरह के रंग लिए
तितली
पहले उड़ा करती थी
घूमा करती थी
वन उपवन में
निर्भय निर्वेग
अब नहीं दिखती
शायद
रंग खोने का डर
या घरों में सजाने का प्रपंच....
अब उड़ने की
गवाही नहीं देता
___________

तितली तो उड़ने के लिए ही होती है ना ....

शुक्रवार, 27 जून 2014

एक बेशर्म....

बेशर्मी तब आई जब
कचोटा गया
ललकारा गया
उकताया गया
अपने अस्तित्व के लिए
अपने मान के लिए
......
जब अपने अंदर झाकोगे
तब समझोगे
......
शर्म करने को जब
कुछ बचता नहीं ...
तब इन्शान
बेशर्म ही बन जाता है .....

दिल में जो आये वो पैगाम लिखना

दिल में जो आये वो पैगाम लिखना
हमने सहर लिखा.. तुम शाम लिखना

कुछ इस तरह से दिलों के रंज भुला
मेरे हिस्से कि धूप भी अपने नाम लिखना

कलम जमाने से रख के रूबरू
महके जो हर खिजां में वो बाम लिखना

मन को फैला के दुनियाँ से बड़ा
कभी काबा तो कभी चार-धाम लिखना

कौशल इस तरह अपनाना खुद को
दिल कि बात दिल से बे-लगाम लिखना

समय बड़ा बलवान

राजा को तू रंक बना दे
रंक को दे दे ताज
बिछडो को तू गले मिलाये
मीतो को बिछडाये
तेरे तो गुणगान करे
सब लोग लगाये आस
अब बदलेगी किस्मत मेरी
सर पर होगा ताज
बनके ऑफिसर आऊंगा
गर तू रहा मेहरबान
शासन देश का चलाऊंगा
गर तूने दे दिया ताज
समय बड़ा बलवान रे भाई
समय बड़ा बलवान ....    

शुक्रवार, 16 मई 2014

यूँ कुछ ...

आस-पास कुछ अहसासों की बात-चीत होती देखी है
दूर किनारे ,साँझ-सकारे पंछी की टोली देखी है
खोज-खबर रखने वालो की ये कैसी हालत देखी है
मुह में राम बगल में छूरी कैसी फरमाईस देखी है ||

भोले-भाले चेहरे है पर ,दिल में छुपी नफरत देखी है
ऊच-नीच और जात-पात की खिची हुयी सरहद देखी है
राह गुजरते यूँही चलते बात बड़ी रोचक देखी है
तू-तू में-में करने की हाय गजब फितरत देखी है ||