शुक्रवार, 22 जून 2012

गज़ल


कौन कहता है कोई जोर नहीं
दिल ये शायाँ* कोई कमजोर नहीं

कोई बतलाता है अपनी,कोई कहता अपनी
सबा* किसकी है कोई ठौर नहीं

अह्बाबे-गम* से मुखालिफ हुए तो क्या अच्छा
मरासिम* न रहा अब है कोई और नहीं

कहाँ ख़ाबीदा* हुए रात की ढलती रो पर
मसाफत* से तो अच्छा है गमे-दौर नहीं  

कौन समझेगा दिले-टेसू कौशल
रेजदे* है ये मेरे कोई अना-दोर* नहीं
________~कौशल~__________

मायने
शायाँ = लायक,,,सबा = हवा,,,अह्बाबे-गम = दोस्ती का गम
मरासिम= रिश्ते,,,,ख़ाबीदा = सोया हुआ, सुप्त, निद्रित
मसाफ़त = distance, दूरीफ़ासला,,, रेजदे= लिखना, काव्य पाठ,,, अना-दोर= घमंडी वाक्य


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