रविवार, 22 अप्रैल 2012

ग़ज़ल


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क्या-क्या खोया सुकून पाने को
देर तक रोना पड़ा गम को भूल जाने को __

जब सफ़र में चले उजाले थे
शाम घिर आयी लौट आने को __

जान ले लेगी आज तन्हाई
कल तमाशा हुआ मानाने को __

बात कुछ ऐसी सुन ली हमने
जामे महफ़िल गए भुलाने को __

फिर सुकून दिल को रह सके कैसे
उसने दिल तोडा आजमाने को __
========================:कौशल

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

ग़ज़ल : चंद अलफ़ाज़



मैकदों की बड़ी इनायत थी
मुझको बस एक यही आदत थी__

परस्तिश के लिए खुदा ढूंढा
दिल लगाने की आदनायत थी__

अब जो मिलना हुआ तो ऐसा हुआ
जेहन में याद तेरे अब तलक सलामत थी__

रकीब पूछता है,अब तो कुछ इनायत कर
चंद महीनो की बस महोलत थी__

जाके बैठूं बता किस महफ़िल में
"कौशल" सीने में कुछ बगावत थी ___

_________~कौशल ~_________________



शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

बुजुर्गो की अनदेखी



उसका मन व्याकुल है
सोच रहा है क्या कमी रह गयी
क्या संस्कारो में
या कुछ विचारों में
पार्क पर बेंच पर बैठे वो व्याकुल है
हाथ में अखबार के चाँद पन्ने
आखो में मोटा चश्मा
शायद खुद को व्यस्त रखने का
साधन ढूड निकला हो उसने
बहू के ताने सुनने से बेहतर तो ये ही है
लोगो को आते जाते देखना
कुछ छोटे बच्चे झूला झूल रहे
उन्हें देख कर आखो में उसकी
कुछ पुरानी यादे तैर आयी
जब अंगुली थामे अपने बेटे का
वो घंटो उसको खेलते देखता बस
उसकी नादानियो को
देख कर मुस्कुराता .... फिर खो जाता
आकुलित उमंगें उन बूड़ी आखो में तैर आयी
आखिर ऐसा क्या हो गया जो
ऊँगली थाम के चलता था
आज जब उसकी ऊँगली पकड़ने की बारी आयी
तो उकताता है... मुह बनता है
बोझ की तरह बाते जताता है
जिसके लिए कभी पूरा घर खाली था
आज उसके पार उस घर के मालिक के लिए एक कमरा न है
वो ...........
पार्क में बैठा इसी उधेड़बुन में है
की क्या होगा जब शाम होगी ?
____________________________:(कौशल)

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

ये आधुनिक समाज

आधुनिक समाज में
हम चल रहे है
जहाँ शून्य शिथिल समाज
लाठी थामे चल रहा है
गढ़ रहा है कुछ अंतर्द्वंद के बीज
जो एक दिन वृक्ष बनेगा
वोही विसंगतिय फैलंगी
वोही कुहाषा होगा
ये आधुनिक समाज
वस्त्रो का आधुनिकरण कर
फिर से जंगली अवस्था में ले जायेगा
जब निर्जीव हो जाएँगी
सीमाए ...
तब ये अट्टहास लगाएगा
ये आधुनिक समाज
कुछ स्वरों में क्रांति लायेगा
जो क्रांति कम "रेवोलुसन" ज्यादा कहलायेगा
बिकंगे रिश्ते मान मर्यादा
फिर से कोहरा घिर जायेगा __
आधुनिकता की राह में
सभ्यता का चोगा पहन
हम भी इतरायेंगे
स्वयं की भाषा को छोड़
दूसरी भाषा में बोलकर अपना मान बढ़वायेगे
और ये अँधा समाज बाहे फैलाये
गले से लगाएगा
ये आधुनिक समाज
ये दिन भी दिखलायेगा__

_______________________: कौशल

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

नजर उसकी


उस गली से गुजरते ही में यार बदला 
कदम कुछ यूँ बहके मस्ल्मे-हाल  बदला __


देखते ही उसको अंजाम हुआ यूँ  
पड़ते ही नजर रंग -ए-रुक्सार बदला __


जब भी दिखाई दें वो मुक्तालिब मेरे 
अंदाज बदला ...... लफ्ज-ए-हाल बदला __


______________________________ :कौशल



शनिवार, 24 मार्च 2012

शहीद दिवस पर कुछ हायकू


मिट गए वो
वतन पे अपने
वीर जियाले __

भगत सिंह
संग थे सुखदेव
थे राजगुरु __

रंगे बसंती
रंग में सारे वीर
थे अभिमानी __

हँसके चूमा
फांसी की बेदी जो थी
शहीद हुए __

तेईस मार्च
काला दिन हो गया
इतिहास का _   :  कौशल

रविवार, 18 मार्च 2012

बदलते लोग














हर वक़्त ही ये लोग बदलते जाएँ
मरहमे साज पे कुछ सुर बिखरते जाएँ__
बंदगी जब से की है यार की बदनाम हो गए
अपने खुदा को पूजने बोलो कहा जाएँ __
कुछ ख्वाब ही दिखा दो युही जागते हुए
सोने का इंतज़ार अब पाले कहाँ जाएँ __
लोग हर वक़्त बदलने की हिमायत करते
मौसम नहीं हर रोज़ जो बदल जाएँ __
अब खुद को मनाने की फुर्सत कहाँ "कौशल "
बस रूठे हुए मेहमाँ को मनाये जाएँ__ :कौशल ०५-०३-२०१२