शनिवार, 5 जनवरी 2013

नया मिलने पे अक्सर ही पुराना छूट जाता है


कभी ये पल कभी बीता फशाना याद आता है
यही दो पल कि दुनिया में रुलाता है हँसाता है

यादों के भरे जाम रहें जीने के लिए याद
खाली रखने पे पैमाना अक्सर फूट जाता है

चाहने वाले जिंदगी में साथ हों हरदम
दूरियों से कभी इजहारे-रिश्ता टूट जाता है

आलम ये है बातो ही बातो में कहीं अक्सर
कभी अबका कभी गुजरा ज़माना रूठ जाता है

कई सदी से रहा है यही अंदाज दुनिया का
नया मिलने पे अक्सर ही पुराना छूट जाता है

शनिवार, 24 नवंबर 2012

जख्मी ख्याल भर गए बा-वक़्त साल भी


जख्मी ख्याल भर गए, बा-वक़्त साल भी
रिसता सा खून जम गया काटों के घाव भी

क्या क्या न चीज देखिये पावों में पड़ी हैं
तन्हाईयों की बेड़ियाँ, लिपटे अजार भी

कब से नाम ले के पुकारा करें मुझे
बदनाम हो गए हैं सुखनवर हजार भी

शामो कि रौशनी में नजर-भर समेट लो
जुडकर ही टूटते हैं हों शीशा या ख्वाब भी

कहने को 'हर्फ़' ही में मिला है कदों-जहाँ
जलने के बाद बच गयी यादें और राख भी

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

यूँ ही हर्फ़ बनके फिरा करूँ


यूँ ही हर्फ़ बनके फिरा करूँ
यूँ ही हर्फ़ बनके मिला करूँ
जो गुजर रही उस धूल में
तुझे कैसे अपनी सदा कहूँ

वो समझता मुझको रकीब है
में समझता उसको रकीब हूँ
ये तो है निगाह का मामला
में यहाँ रहूँ या वहाँ रहूँ

जो समझना चाहे मुझे समझ
हर रंग को तैयार हूँ
जो लगूं सुबह तो हूँ मखमली
जो बयार हूँ तो बयार हूँ

वो जो बोलते हैं खलूस से
मुझे याद करता नहीं है ‘हर्फ़’
जो रहा नहीं था कभी अलग
उसे कैसे खुद से जुदा कहूँ

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

विसंगतियों की चोट


उगते सूरज सा तेज लिए
उतरा भू में अभिगाम हुआ
दो नैनों संग व्याकुल मुखडा
लाखो सपनो का गाँव हुआ

फूलो कि सेज मिली सोने
अम्बर खुसियो का धाम हुआ
छोटी सी दो अंजुलियों में
हर्षित सारा ब्रह्माण्ड हुआ

उगता चंदा खिलते तारे
यही कहानी कहते थे
सुन्दर परियों के डेने में
रात ढली कि घाम हुआ
............
कुछ करने कि थी चाह बड़ी
कुछ पाने का अभिमान हुआ
लहरों पे टिके घरोंदे पर
देखा उसका भी नाम हुआ

मानवता का ज्ञान उसे
कुछ अहसासों के बाद हुआ
बस्ती बस्ती जब भटक लिया
तब जाकर आराम हुआ....

घनघोर प्रलापों से उठकर
वो अंत-हीन भटका था बहुत
शीतल वन की थी चाह उसे
तपता रेत प्रलाप हुआ....

उस एकाकी अनजान प्रहर में
भटक-भटक कर टूट-टूट कर
अप्लव मंथन सा व्याकुल सा
अर्थ-हीन संताप हुआ.....
............
वो जाग गया वो भाग गया
जब देखा रूप निढाल हुआ
इस मदिरालय की हाला से,
बेहतर जाना बनवास हुआ.....
____ : कौशल

रविवार, 30 सितंबर 2012

वर्ण के नाम पर आरक्षण


द्रश्य १_______
अखबार में
इस्तहार निकला
फलां पोस्ट फीस
सामान्य ६००/- एसटी  १००/-
एससी ५० /- मात्र
माँ-बाप ने किचन के
अखबार के नीचे ,
गुल्लक से
जहाँ से हो सके
रुपये इकठ्ठा किये
पर फिर भी कम पड़ गए
अपने नौनिहाल के फॉर्म के लिए .......
वह बोला ..
माँ इस देश में
गरीब होना पाप है
वर्ण चाहे कुछ भी हो ...

द्रश्य २____
सरकारी स्कीम निकली
वर्ण के नाम पर दलित तपके
को उठाया जाएगा
ऊँचे ओहदे वाले
दलितो ने सब्सिडी का
पूरा फायदा उठाया
लेकिन खेतों में काम
करने वाला हरुवा
जो अपने परिवार संग
अब भी उसी दशा में रहने को
बाध्य है ,, जैसा पहले था
कसूर किसका? ......
सरकार बोलती है
हरुवा का ही होगा
जो अपनी दशा से
उठना ही नहीं चाहता !!
........

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

वियोग



है विरह या ये प्रलाप है
या झरती आसूं माला है
शून्य समर्पित जिस वाणी को
ये वियोग रीति हाल है
कभी सुनाई दें जो बाते
कभी है आप्लव व्याकुल आखें
शब्दों के ताने-बाने में
ये वियोग कि परिभाषा है
_____~कौशल~_______

शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

बनाने वाले ने इस जहाँ में ना जाने कैसे नियम बनाया


बनाने वाले ने इस जहाँ में ना जाने कैसे नियम बनाया
किसी की लय में अजान आई ,किसी के सुर में है राम आया ||

कोई तडफता है सादगी को किसी को भाती है रंगदारी
जहाँ में कैसे हैं रहने वाले सभी ने खुद को खुदा बनाया ||

जबां परेशाँ,निगाह है रुसवा, ये दौर है क्या कहाँ की महफ़िल
जो सहने वाले थे..सह के बोले, क्या हाल खुद का है ये बनाया ||

कभी पशेमाँ जो हो सको... तो ला के दे दो वो चार लम्हे
जहाँ समझ के हर एक इन्शान हमी ने अपना वतन बनाया ||

कभी जो "कौशल" वो याद करके जी भर के रोया, सकूँ ना आया
जहाँ थिरकती थी जिंदगी अब वहाँ पे हिज्र-ए -मकाम पाया ||
 _______________~कौशल~____________________