गुरुवार, 2 अगस्त 2012

गज़ल


गम पास था कि पल बड़े तन्हा थे शाम में
गुजर था वो ख्याल, इसी दौरे-आम में

जब पास कि फिकर पड़ी सब दूर थे बड़े
मौसम कि ये कशिस थी बड़ी देर शाम में

कुछ उम्र कि किताब पड़ी याद आ गया
सब कुछ था जो लिखा हुआ ढलते पयाम में

रुसवा हैं एक-दूसरे से हमसब क्यों इस तरह
वो फर्क ही बता दो जो है अल्लाह औ राम में?

जीने को तो बदी में भी जी लेते कितने लोग
हमको ही चैन है नहीं दौरे-तमाम में

चलते हुए सफर में,,,,,, बैठे जो सोचने
सारे ख्याल आये बड़े एहतराम में
__________~कौशल~__________

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

:फिर ना याद आ तू मुझे :

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क्या है वो बात ये बता तू मुझे
फिर से एक रोज आजमा तू मुझे .....

दर्द कैसा है ये खालिस क्यों है
ना दे बदली हुयी फिजा तू मुझे .....

चोट के साथ घाव लग जाता
याद कर के ना भूल जा तू मुझे .....

बारिशें हो रही यहाँ दिल में
अब ना हर रोज यूँ सता तू मुझे .....

जाम रक्खे है बचा याद के मोती डाले  
"कौशल" हर रोज ना पिला तू मुझे ....
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गुरुवार, 5 जुलाई 2012

ख्वाब आये थे खोजते मुझको.....


पता मेरा लिए कुछ पुराने ख्वाब आये थे
पूछते थे की वो शख्स रहता था यहां
इन्ही दरख्तों के नीचे इन्ही दीवारों के बीच
ख्वाब आये थे खोजते मुझको.............
पूछा किये थे सभी से राहगुजर थे जो भी
कहाँ है वो शख्स जो रहता था यहाँ
बुनता था हमें जो खुले आसमा के नीचे
ख्वाब आये थे खोजते मुझको...............
किसी ने झिड़का किसी ने समझाया
नहीं पता कहाँ है वो शख्स जो रहता था यहाँ
क्यूँ ढूंडते हो ना मालूम बिखर गया है कहाँ
ख्वाब आये थे खोजते मुझको.......
कहीं से एक हवा आई गुजती बहती
ख्वाबो ने दोहराया वही शख्स रहता था यहाँ
हवा बहती हुयी बोल कानो में  .......
ढूंडते हो जिसे वो शख्स कबका मर भी गया.......
अब तो सिर्फ जिस्म है जो रूह थी
उसका पता उसको भी नहीं जो रहता था यहाँ
ढूंडते हो किसे वो तो है ही नहीं.........
ख्वाब आये थे खोजते मुझको.........................
__________~कौशल~______________

रविवार, 1 जुलाई 2012

गज़ल:रात गुजरी है यूँही छत पे सहर होने को


जाम बाँकी है ,पैमाने-असर होने को
रात गुजरी है यूँही छत पे सहर होने को

कहीं तन्हाई डसेगी तो मुझे पूछोगे
जान होती है यूंही उम्र बसर होने को

कोई सदका नहीं ,सलाम नहीं,बात नहीं
क्यों छुपाते हो गमे अपना सजर होने को

जिस घडी मेरी निगाहों ने खालिस देखी थी
वक्त वो भी था कुछ और नजर होने को  

जब से चलना ही रहा फितरते-अपनी कौशल
शाम देखि न सहर देखी फजल होने को
________~कौशल~______________

शुक्रवार, 22 जून 2012

गज़ल


कौन कहता है कोई जोर नहीं
दिल ये शायाँ* कोई कमजोर नहीं

कोई बतलाता है अपनी,कोई कहता अपनी
सबा* किसकी है कोई ठौर नहीं

अह्बाबे-गम* से मुखालिफ हुए तो क्या अच्छा
मरासिम* न रहा अब है कोई और नहीं

कहाँ ख़ाबीदा* हुए रात की ढलती रो पर
मसाफत* से तो अच्छा है गमे-दौर नहीं  

कौन समझेगा दिले-टेसू कौशल
रेजदे* है ये मेरे कोई अना-दोर* नहीं
________~कौशल~__________

मायने
शायाँ = लायक,,,सबा = हवा,,,अह्बाबे-गम = दोस्ती का गम
मरासिम= रिश्ते,,,,ख़ाबीदा = सोया हुआ, सुप्त, निद्रित
मसाफ़त = distance, दूरीफ़ासला,,, रेजदे= लिखना, काव्य पाठ,,, अना-दोर= घमंडी वाक्य


गुरुवार, 14 जून 2012

बातें असर होगी..

कभी चर्चा चला पहरों ,कहीं महफ़िल ग़ज़ल होगी
मेरे हिबड़े की हसरत कल तेरे अहले नजर होगी  

में फरमाऊ बता क्या? मेरे दिल की सुन सके कोई 
मुझे जिस बात का था इल्म ,बाते वो असर होगी

सुना है.... दूर बस्ती में सहर होती है इठलाकर
जो गुजरूँ उस गली हमपर भी थोड़ी तो फ़जल होगी  

बस अब थोड़ी सी जुम्बिस रह गई, वो याद आता है
क़ज़ा होने से पहले ज़िन्दगी यूँ ही बसर होगी

कहाँ इमान "कौशल" लुट गया बैरम ज़माने का
यही बतलाएं अपना कुछ न बस, अंजामे-सजर होगी 
__________~कौशल~____________
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मायने :::::::::::::::::::
हिबडा: दिल ,ह्रदय  ,
फ़जल : कृपा ,,
जुम्बिस : जुडाव ,,
क़ज़ा : बरबाद,,
सजर : कब्र ,ताबूत 

रविवार, 10 जून 2012

ग़ज़ल


मोहोबत का असर है ये कि कुछ खोया नहीं जाता
कभी दिनभर भटकता हूँ कभी सोया नहीं जाता

जहाँ में ढूढता था चेन ,शहरे-शोरगुल ही था
कभी महसूस होता कुछ ,कभी बोला नहीं जाता

जुबान खामोश है लेकिन समंदर बह रहा अन्दर
कभी लहरों में गुम जाऊं ,कभी खोया नहीं जाता

पुकारा जब निगाहों से तो हरदम बेकरारी थी
कभी जीभर निहारूं और कभी देखा नहीं जाता

लगी है चोट ऐसी, जिसका देखो क्या मजा कौशल
कभी हँसाना मुनासिब न, कभी रोया नहीं जाता
_________~कौशल ~_______________